Sunday, August 11, 2013



जैव-विविधता संरक्षण के बिश्नोई मॉडल की उत्पत्ति एंव विकास में बिश्नोई समुदाय के खाद्य व्यवहार की भूमिका
(The origin & evolution of Bishnoi Model of Biodiversity Conservation (BMBC): The role of food habit of Bishnois.)

सन 1485 में बिश्नोइज्म की स्थापना के साथ ही “जैव विविधता संरक्षण के बिश्नोई मॉडल” (Bishnoi Model of Biodiversity Conservation) की उत्पत्ति हुई किन्तु सर्वप्रथम इस शब्द का प्रयोग एंव इसकी अवधारणा (Conceptualization) जून 2013 में अमर ज्योति पत्रिका (ISSN 2277-7660) के पर्यावरण विशेषांक में संतोष पुनिया के द्वारा लिखित “मरुस्थलीय पर्यावरण, जैव-विविधता संरक्षण और बिश्नोई समुदाय का पारम्परिक वैज्ञानिक ज्ञान” नामक लेख में दी गयी.  इस मॉडल के बारे में इस लेख में लिखा गया, “शताब्दियों में विकसित एंव पीढ़ियों में हस्तांतरित बिश्नोई समुदाय के पारम्परिक वैज्ञानिक ज्ञान (Traditional scientific knowledge) की विपुल राशी जैव विविधता संरक्षण के ‘बिश्नोई मॉडल’ (Bishnoi model of biodiversity conservation) के रूप में विकसित हो चुकी है. वन्य जीवन के समग्र और चिरस्थायी (Holistic & everlasting ) संरक्षण पर आधारित यह एक विज्ञान सम्मत मॉडल है. इस मॉडल में जैव-विविधता के संरक्षण और उपयोग (Conservation & utilization) का संतुलन अविश्वसनीय है. शाकाहारी आहार-व्यवहार (Vegetarian food habit), न्यूनतम संसाधन दोहन (Minimum resource exploitation) और वन्य जीवों के प्राकृतिक निवास (Natural habitat) अर्थात वन का विनाश न होने देना इस मॉडल के केंद्र में है.
प्रतिरोध (Resistance), आत्मबलिदान (Self-sacrifice) एंव खाद्य-संयम (Food-restraint) इस मॉडल की अन्य अति-महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं  जो जैव-विवधता संरक्षण के किसी भी वैज्ञानिक जनित मॉडल (Scientifically designed model) में नही मिलती है.
पेड़-पौधों एंव जीव-जंतुओं (Flora & fauna) सहित सजीवों की प्रत्येक प्रजाति का अस्तित्व बने रहना मानव के हित में है. पृथ्वी पर सजीवों की प्रजातियों की प्रचुरता को ही जैव-विविधता (Biological diversity) कहा गया है. सजीवों की यही विविधता ही मनुष्य की  आधारभूत आवश्यकताओं (Fundamental human needs) (आहार, निवास, परिधान, औषधि, सौन्दर्यबोध इत्यादि) की पूर्ति करती है, किन्तु मनुष्य के द्वारा किये जा रहे प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन (Overexploitation of natural resources) के कारण पृथ्वी की जैव-विविधता संकट में है. प्रत्येक वर्ष पेड़-पौधों एंव जीव-जंतुओं की हजारों प्रजातियाँ विलुप्त (Extinct) हो रही हैं और इनमे से कुछ तो वे हैं जिन्हें मनुष्य अभी खोज भी नही पाया था (Extinction of undiscovered species).
बिश्नोई बाहुल्य क्षेत्र (Bishnoi inhibited areas) विश्व के सर्वाधिक जैव-विविधता सघन (Biodiversitically rich human inhibited areas) दुर्लभ ग्रामीण एंव नागरीय क्षेत्रों में से है तथा इसका प्रमाण स्थानीय शासनों (राजस्थान, हरियाणा, पंजाब आदि) के द्वारा बिश्नोई बहुल क्षेत्रों को अभ्यारण (Sanctuary) घोषित करना है. भारत के सर्वाधिक वनावरण युक्त राज्यों के वन प्राणियों की अनुपस्थिति में सुनसान है लेकिन बिश्नोई क्षेत्रों में वन ना होते हुए भी दुर्लभ जीव एक सामान्य दृश्य है, ऐसा क्यों है?
बिश्नोई क्षेत्रों में जैव-विविधता का यह तुलनात्मक आधिक्य एक अंतर्निहित आधारभूत मॉडल की ओर इंगित करता है. यही मॉडल “जैव विविधता संरक्षण का बिश्नोई मॉडल” है.
“जैव विविधता संरक्षण के बिश्नोई मॉडल” की आधारभूत संरचना पर जब मैंने अनुसन्धान आरम्भ किया तो मुझे अनुभव हुआ की यह मॉडल कुछ आधारभूत स्तंभों पर विकसित हुआ है. किन्तु बुनियादी रूप से यह संरक्षण की धार्मिक बाध्यता पर ही आधारित है जो कालान्तर में बिश्नोई जनमानस की व्यवहारिकता में समाहित हो गयी है. जैव-विवधता संरक्षण बिश्नोई लोगों, विशेषकर बिश्नोई महिलाओं के द्वारा दिए गये आत्म्बलिदानों के कारण बिश्नोई अवचेतन का स्थायी भाग बन चुका है.
इस अनूठे किन्तु अभी तक अनावधारित (Non-conceptualized) मॉडल के विश्लेषणात्मक अन्वेषण (Analytical investigation) के क्रम में जब मैं तपते मरुस्थल की खाक छान रही थी तब मैं इस नतीजे पर पहुंची की “बिश्नोई आहार-व्यवहार” (Bishnoi food habit) इस मॉडल का एक मूल आधार सतम्भ है. 
आहार-व्यवहार (Food habit) से अभिप्राय उस प्रक्रिया से है जिससे हम उपलब्ध विकल्पों में से अपना आहार-चयन (Food choice) करते हैं. समुदायों का आहार-व्यवहार उनके इतिहास, सांस्कृतिक एंव धार्मिक मूल्यों एंव आर्थिक स्थिति का परिचायक होता है. यह मनुष्य की मानसिक, आर्थिक एंव सामजिक स्थिति का द्योतक है. आहार चयन मुख्यत स्वाद आधारित होता है यधपि मूल्य, उपलब्धता, सुभीता, संज्ञानात्मक सयंम (Cognitive restraint) एंव सांस्कृतिक संबंधता (Cultural familiarity) अन्य कारक हैं.
आहार राजनीति (Food politics) समकालीन विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों की विदेश नीति के एजेंडा में उच्च स्थान रखती है. बिश्नोइज्म में धार्मिक आहार-सिद्धांतो (Religious food principles) का एक सुदृढ़ समुच्चय अस्तित्व में है. बिश्नोई आहार-चयन को यही नियमावली नियंत्रित करती है एंव संज्ञानात्मक संयम इसके केंद्र में है .
बिश्नोई दुग्ध-शाकाहारी (Lacto-vegetarian) परम्परा के अनुयायी हैं. यदपि कई बिश्नोई वेगान (Veganism) परम्परा का भी अनुसरण करते हैं जिसमे किसी भी पशु उत्पाद (दूध एंव इसके उत्पाद, उन, चमड़ा आदि) का प्रयोग नही किया जाता है. समकालीन विश्व में बहुत से समुदाय एंव समाज शाकाहारी हैं किन्तु इस सन्दर्भ में बिश्नोइज्म जैसी दृढ़ता निश्चित ही दुर्लभ है. बिश्नोई शाकाहार केवल मात्र धार्मिक उत्तरदायित्व (Religious responsibility) की सीमाओं से आगे बढ़कर मरुस्थलीय पर्यावरण,  सांस्कृतिक मूल्यों एंव जैव-विविधता के सह-अस्तित्व (Coexistence of biodiversity) के मूलभूत अधिकार की रक्षा तक विस्तारित हो जाता है. शाकाहारी होने में बिश्नोइज्म का दृष्टिकोण भावनात्मक ना होकर वैज्ञानिक है एंव यह बिश्नोई क्षेत्रों में जैव-विविधता की सघनता से परिलक्षित होता है.
जैव विविधता संरक्षण के बिश्नोई मॉडल के विकास में बिश्नोई महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. प्रतिरोध एंव आत्मबलिदान की महान परम्पराएँ बिश्नोइज्म में महिलाओं के द्वारा ही आरम्भ की गयी. इसका एक संभव कारण बिश्नोइज्म में महिलाओं को मिली हुई उच्च पारिवारिक एंव सामजिक प्रतिष्ठता भी है जिसमे बिश्नोई सामजिक व्यवस्था के द्वारा महिलाओं को बिना किसी संकोच के नेत्रित्व के अधिकार (Right to lead) से सुशोभित किया गया है. बिश्नोई आहार-चयन भी एक पूर्णतया महिला विषय (Female subject) है. बिश्नोई महिलाओं का पाक कला, भण्डारण, प्रसंस्करण आदि आहार सम्बंधित पारम्परिक ज्ञान (Traditional knowledge) ही इस मॉडल की सञ्चालन शक्ति (Driving force) है. है इस मॉडल में न केवल जैव विविधता का संरक्षण अपितु पारिवारिक खाद्य सुरक्षा (Food security of the family) एंव स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा गया है. बिश्नोई संस्कृति में उपलब्ध आहार की उपेक्षा अथवा उसे व्यर्थ करना पाप माना गया है. साधारण किन्तु पौष्टिक आहार बिश्नोई आहार-संस्कृति (Bishnoi food culture) का मुख्य पहलू है.
ठेठ बिश्नोई आहार में कृष्ट (Cultivated) एंव वन्य (Wild) दोनों प्रकार के उत्पादों की अभूतपूर्व विविधता एंव समन्वय है. खेजड़ी, काचर, कैर, कुमट, ककड़ी, बेर, पीलू, मतीरा, इत्यादि वन्य पेड़-पौधों के एकाधिक उत्पाद बिश्नोई आहार का अंग हैं. बाजरा (Pearl millet) बिश्नोई आहार का मुख्य अन्न है एंव एक फसल के रूप में बाजरा पशु-पक्षियों की अधिकतम देसज प्रजातियों (Indigenous species) को आकर्षित करता है जो इसे खाकर अपना अस्तित्व बनाये रख पाने सफल हैं. “चिड़िया चुग गयी खेत” नामक लोकोक्ति में खेत में उगी हुई फसल बाजरा ही है. इसके अतिरिक्त दूध तथा दुग्ध-उत्पादों का भी समुचित प्रयोग बिश्नोई आहार व्यवस्था (Bishnoi dietary regime) में देखने को मिलता है. पर्यावरणीय सीमाओं (Environmental limits) में पारम्परिक ज्ञान के माध्यम से उपलब्ध जैव-विविधता (Available biodiversity) का समुचित प्रयोग करते हुए आहार-प्रबंधन (Diet management) करना केवल मात्र बिश्नोइज्म की ही विशेषता है. जैव विविधता खाद्य-सुरक्षा की गारंटी है एंव सुरक्षित खाद्य-व्यवहार (Safe food behavior) इस अमूल्य जैव-विविधता को संजो कर रखने में सहायक है, यही “जैव विविधता संरक्षण के बिश्नोई मॉडल” की प्रमुख अवधारणा है. देसज खाद्य आदतों (Indigenous food habits) को विश्व भर में जैव-विविधता की सुरक्षा हेतु बढ़ावा दिया जा रहा है ऐसे समय में बिश्नोई खाद्य आदतें (Bishnoi food habits) उच्च आदर्श के रूप में सदियों से विश्व के सबसे दुरूह भूभाग में सफलतापूर्वक संस्थापित हैं.
संधारणीय आहार (Sustainable diet) की परिकल्पना को वैश्विक संगठन जैव-विविधता संरक्षण इसके योगदान को जोर-शोर से प्रायोजित कर रहे हैं. संधारणीय आहार वे खाद्य पदार्थ हैं जिन्हें प्रकृति से प्राप्त करने में पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव न्यूनतम है. बिश्नोई आहार पूर्णतया संधारणीय इसलिए हैं क्योंकि इन्हें प्राप्त करने में पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) के किसी भी घटक को हानि नही पहुंचाई जाती है. शाकाहारी होने के कारण उर्जा आवश्यकताएं प्रथम ट्रोफिक स्तर (First trophic level) पर पूरी करना पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को बहुत कम कर देता है. इस प्रकार बिश्नोई आहार का कार्बन एंव जल पदचिन्ह न्यूनतम (Carbon and water footprint) है. जिन खाद्यानों को खाद्य बनाने में जितनी अधिक उर्जा एंव जल का उपयोग होता है उनका कार्बन एंव जल पदचिन्ह अधिक होता है तथा वे पर्यावरण पर उतना ही अधिक दबाव डालते हैं जिसकी पराकाष्ठा जैव-विविधता के अपरिवर्तनीय ह्रास (Irreversible loss of biodiversity) के रूप में होती है.
क्या बिश्नोई आहार केवलमात्र पर्यावरणीय दृष्टिकोण से ही सटीक है? क्या इनका पौष्टिकता पहलू (Nutritional aspect) गौण है?
हष्ट-पुष्ट देह, उच्च स्वास्थ्य स्तर एंव दीर्घायु (Longevity) बिश्नोई समुदाय की पहचान है एंव यह बिश्नोई आहार की पौष्टिकता के सन्दर्भ में पर्याप्त टिपण्णी है.
सन 1950 में नगदी फसलों के विकास के साथ ही देसज आहार पद्धतियों का विस्थापन (Displacement of indigenous food systems) आरम्भ हुआ किन्तु इस घटना के लगभग आधी सदी के बाद भी बिश्नोई आहार-व्यवहार अक्षुण बना हुआ है. इसका परिणाम यह हुआ की देसज वृक्ष (Indigenous trees) जो बिश्नोई आहारों से किसी भी प्रकार से जुड़े हुए थे, अब तक अपना अस्तित्व बनाये रख पाए हैं जबकि अन्य क्षेत्रों से ये विलुप्त हो चुके हैं. परिणामस्वरूप इन वृक्ष प्रजातियों पर निर्भर करने वाली जीव-जन्तुओ की प्रजातियाँ भी उत्तरजीवी हो पाई हैं. अन्य क्षेत्रों में विलुप्त होती प्रजातियों के बिश्नोई क्षेत्रों में प्रश्रय-प्रवेश (Diffusion) के कारण भी बिश्नोई निवासित क्षेत्रों की जैव-विविधता सघन हुई है. बिश्नोई मुख्यत: देश के सबसे कम वर्षा वाले क्षेत्र में निवास करते हैं. बिरानी कृषि में कीटनाशकों का प्रयोग लगभग नगण्य है और यह तथ्य भी जैव-विवधता संरक्षण में महत्पूर्ण योगदान देता है.  
उच्च उर्जाधारक पाश्चात्य आहार तंत्र (High calorie based western food system) से अभी तक बिश्नोइज्म ने स्वयं को सुरक्षित रखा है. नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण (Economic reforms) से उपजा उपभोक्तावाद (Consumerism) खाने के सन्दर्भ में पौराणिक सांस्कृतिक अथवा अनुभव आधारित नियमों (Ancient cultural & experience based food principles) को खोखला कर रहा है. आहार उतरोत्तर सामाजिक दर्जे (Social status) का संकेतक बनता जा रहा है. आधुनिक आहार उत्पादन उपक्रम (Modern food production system ) को जैव-विविधता क्षरण का एक प्रमुख कारण माना गया है. हम क्या खाते हैं और कितना खाते है इसका सीधा सबंध प्राकृतिक पर्यावरण के स्वास्थ्य (Health of natural environment) से है. आहार नैतिकता (Food ethics) में बिश्नोइज्म एक सर्वोपरी सभ्यता है. न्यूनतम आगत (Low input) तथा मौसमी वृक्ष उत्पादों (Seasonal floristic produces) के संवहनीय दोहन (Sustainable exploitation) पर आधारित ठेठ बिश्नोई आहार व्यवस्था (Bishnoi food system) में उपभोक्तावाद का स्तर शून्य है. स्वाद (Taste) आहार चयन का प्राथमिक निर्धारक है तथा स्वाद को अनुभव करने की क्षमता आनुवंशिक (TAS2R38 जीन) होती है एंव इस आधार पर वैश्विक जनसँख्या को सुपर टेस्टर (Supertaster), टेस्टर (Taster) एंव नॉन-टेस्टर (Non-taster) में विभाजित किया गया है. नॉन-टेस्टर श्रेणी में खाने का स्वाद महत्वपूर्ण नही होता है एंव इस श्रेणी के लोग बाकि दोनों श्रेणियों से आहार चयन के संदर्भ में अधिक लचीले (Flexible) होते हैं अर्थात इनके आहार का दायरा अधिक विस्तृत होता है.
अपने अनुसन्धान से मैंने यह पाया की शाकाहारी दायरे के भीतर भी बिश्नोई जनसँख्या की आहार सीमायें (Food limits) विस्तृत हैं. यह बिश्नोई आहार में प्रयोग किये जाने वाले विविध उत्पादों से प्रमाणित हो जाता है. विश्व की सर्वाधिक पर्यावरण हितैषी आहार व्यवहार (World’s most environment friendly food habit) का सृजन करने वाली सभ्यता का स्वाद क्षमता के आधार पर वर्गीकरण किया जाना निश्चित ही भविष्य के आहार-व्यवहार के निर्धारण में सहायक सिद्ध हो सकता है.
आधुनिक समय में जब आर्थिक एंव शैक्षिक स्थिति (Economic & educational status) आहार चयन के प्रबल कारक हैं उस समय में बिश्नोई आहार-चयन वर्षों के पारम्परिक ज्ञान एंव अनुभव संचालित है जो अन्ततोगत्वा जैव-विविधता संरक्षण में अभूतपूर्व योगदान के रूप में फलित हो रहा है.  
एक सामान्य व्यक्ति एक दिन में खाने के बारे में 250 बार सोचता है तथा अंग्रेजी भाषा की एक लोकोक्ति में तो यहाँ तक कहा गया है की खाना हमारे व्यक्तित्व के माध्यम से प्रतिबिम्बित होता है (We are what we eat). बिश्नोई आहार-व्यवहार पर किया गया यह कार्य आगामी अनुसंधानों की नींव बनेगा एंव आहार की बिश्नोई प्रणाली भविष्य की वैश्विक आहार प्रणाली के रूप में विकसित होगी, ऐसा मैं विश्वाश रखती हूँ.
संतोष पुनिया

Sunday, August 4, 2013



हरी कंकेड़ी मंडप मेड़ी जहाँ हमारा वासा: श्री गुरु जम्भेश्वर के कथन के गूढ़ वैज्ञानिक अभिप्राय
(Maytenus imarginata: The mystic tree of Bishnoism)
बिश्नोई धर्मग्रंथ सबदवाणी (Sabadvani) में पृथ्वी अठारह भार वनस्पति से सुशोभित बताई गयी है एंव बिश्नोई पौराणिकी (Bishnoi Mythology) में वृक्षों की बहुत सी प्रजातियों (Species) का सन्दर्भ प्राप्त होता है. इन सभी प्रजातियों में से कंकेड़ी वृक्ष को बिश्नोइज्म में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है एंव यह बिश्नोइज्म के प्रथम वृक्ष (First tree of Bishnoism) के रूप में स्थापित है. बिश्नोई इतिहास, पौराणिकी एंव धर्मग्रंथों में कंकेड़ी के प्रति बिश्नोइज्म की प्रगाढ़ श्रद्धा के कारण सुसपष्ट हैं.   
सबदवाणी सबद संख्या 73 की प्रथम पंक्ति में श्री गुरु जम्भेश्वर ने कहा: “हरी कंकेड़ी मंडप मेड़ी जहाँ हमारा वासा” (कंकेड़ी वृक्ष मेरे निवास हैं). उन्होंने स्वयं को भगवान विष्णु का अवतार अर्थात ईश्वर माना. इस प्रकार अर्थ यह निकला की कंकेड़ी वृक्ष में ईश्वर का निवास (God’s dwelling) है. विश्व के सभी धर्मों में ईश्वर को सर्वव्यापक (Omnipresent) माना गया है किन्तु साथ ही यह भी माना गया है की उसकी उपस्थिति का अनुभव करना दुष्कर है और यह कठोर मानसिक अभ्यास एंव अध्यात्मिक उत्थान से ही संभव हो सकता है. ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव करना पूर्णानंद (Bliss) है एंव विश्व के सभी धर्म और धर्मगुरु उसकी उपस्थिति को अंत:करण व बाह्य: करण में अनुभव करने का सन्देश देते हैं. बिश्नोइज्म में भगवान का अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन (Exaggerated glorification) ना करते हुए उसके नाम को जपकर उसकी उपस्थिति को अनुभव करने का सन्देश है. (विष्णु-विष्णु तू भण रे प्राणी).
इन सब में विचारणीय यह है की मरुस्थल में उपलब्ध असंख्य वृक्ष प्रजातियों में से श्री गुरु जम्भेश्वर ने स्व-निवास का दर्जा केवल कंकेड़ी को ही क्यों दिया? अन्य किसी वृक्ष की अपेक्षा उन्होंने कंकेड़ी को ही सर्वश्रेष्ठ क्यों चुना? निर्वाण के लिए भी उनका इसी वृक्ष को चुनना क्या मात्र एक संयोग है अथवा यह कंकेड़ी वृक्ष की रहस्यमयी महत्वपूर्णता (Mystic significance) के बारे में उनके द्वारा छोड़े गये गूढ़ संकेतों की एक श्रृंखला है?
कंकेड़ी में छुपे कुछ गहन रहस्यों की ओर श्री गुरु जम्भेश्वर ने अपने समयकाल में बहुत से संकेत दिए. क्या इस वृक्ष में कुछ अध्यात्मिक अथवा परालौकिक रहस्य छुपे हैं? क्या इस वृक्ष का जीवन चक्र (Life cycle) कोई ईश्वरीय सन्देश का पर्याय है? क्या श्री गुरु जम्भेश्वर इस वृक्ष को बिश्नोइज्म के सजीव ग्रन्थ (Alive Scripture) के रूप में स्थापित करना चाहते थे? क्या उन्होंने कंकेड़ी वृक्ष को ईश्वर (बिश्नोइज्म के सन्दर्भ में “विष्णु”) की उपस्थिति अनुभव करने के एक माध्यम के रूप में निरुपित किया था? सामयिक विश्व (Contemporary World) के कई धर्मों में वृक्ष-आराधना (Dendrolatry) का प्रचलन है किन्तु बिश्नोइज्म की यह अवधारणा पूर्णतया नवीन व अनूठी प्रतीत होती है जिसमे एक वृक्ष विशेष को ईश्वर-अनुभूति का माध्यम माना गया है.  
कंकेड़ी वृक्ष को हिंदी में कंकेड़ी, कंकेडो तथा मालकंगनी अंग्रेजी भाषा में “थोर्नी स्टाफ ट्री” (Thorny staff tree) और संस्कृत में “विकंकटा” के नाम से जाना जाता है. इसका वैज्ञानिक नाम Maytenus emarginata (मैटीनस इमारजीनेटा) है जो सिलेसट्रेसी (Celastraceae) वृक्ष-परिवार (Tree family) से सबंधित है. वास्तव यह एक झाड़ी (Shrub) होती है जो वर्षों के बाद एक छोटे वृक्ष में रूपांतरित हो जाती है. चारा, लकड़ी, इंधन, छाया इसके मुख्य उत्पाद हैं. यह एक सदाबहार वृक्ष (evergreen tree) है जो मरुस्थलीय पर्यावरण के द्वारा अधिरोपित (Imposed) विभिन्न प्रकार के तनावों (Stresses) को आसानी से सहन कर सकने में सक्षम है. मरुस्थल के जीवन प्रतिकूल वातावरण में इसका सदाबहार होना इसके विशेष होने का प्रथम संकेत है. क्या इस वृक्ष में ईश्वरीय उपस्थिति इसके सूखे रेगिस्तान में सदाबहार होने का कारण है? दूसरा संकेत इसका जैविक रोगकारक परजीवियों (Biological stresses) से सर्वथा मुक्त होना है.  यह इसके चमत्कारी औषधीय (Miraculous medicinal effects) प्रभावों का संकेत भी है.
बिश्नोइज्म में पवित्र माने जाने के अतिरिक्त मरुस्थलीय पर्यावरण (Environment) एंव पारिस्थितिकी (Ecology) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हुए भी यह एक संकटग्रस्त (Endangered) प्रजाति है. इसके संकटग्रस्त होने के मुख्य कारण अंधाधुंध कटाई से अत्यधिक दोहन (Overexploitation), अकाल (Drought), पक्षियों एंव अन्य जंतु जो इस वृक्ष के बीजों को स्थानांतरित (Seed dispersing species)  करते हैं की संख्या में आ रही निरंतर कमी, विदेशी वृक्ष प्रजातियों (Invasive alien species) जैसे की इजरायली बबूल (Acacia tortilis), विदेशी कीकर (Parkensonia), कुमट (Acacia senagal), (Prosopis juliflora) आदि की मरुस्थलीय पारितंत्र (Ecosystem) में प्रचंड घुसपैठ है.
एक आधार प्रजाति (Keystone species) होने कारण इसका पारिस्थितिकीय एंव पर्यावरणीय महत्व और अधिक बढ़ जाता है. आधार प्रजाति से अभिप्राय उन प्रजातियों से है जिनके अस्तित्व पर अन्य दूसरी प्रजातियों का अस्तित्व निर्भर करता है. कंकेड़ी वृक्ष अन्य कई जीव जंतुओं एंव पक्षियों को निवास एंव पत्तियों व फलों के द्वारा भोजन उपलब्ध करवाकर इन प्रजातियों के अस्तित्व को बनाये रखने में सहायक है.
दुर्लभ होते जा रहे इस वृक्ष के संरक्षण हेतु जैव प्रोद्योगिकी विभाग, विज्ञान एंव तकनीक मंत्रालय, भारत सरकार की संस्था “कन्सोर्शीअम ऑफ़ माइक्रोप्रोपगैशन रिसर्चर्स एंड टेक्नोलजी डेवलपमेंट” (Consortium of Micropropagation Researchers and Technology Development, Department of Biotechnology, Ministry of Science and Technology, Governement of India) ने राजस्थान राज्य में से कंकेड़ी वृक्ष के जननदर्व्यों (Germpalsm) का समाहरण (Collection) किया जिसमे कुछ महत्वपूर्ण जननदर्व्यों का समाहरण बिश्नोई तीर्थ स्थलों मुकाम एंव खेजडली से किया गया. बिश्नोई समुदाय के लिए कंकेड़ी वृक्ष का महत्व बताते हुए इस रिपोर्ट में लिखा गया, “It is sacred plant for environment-friendly Bishnoi community. It is believed that Lord Jambheshwar (Jambhoji) has realization under tree of Maytenus emarginata. (यह पर्यावरण हितैषी बिश्नोई समुदाय के लिए एक पवित्र वृक्ष है. ऐसी मान्यता है की भगवान जम्भेश्वर (जाम्भोजी) को इस वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई). यह सुचना हालांकि तथ्यात्मक रूप से सही नही (Factually incorrect) है (क्योंकि जाम्भोजी ने इस वृक्ष के नीचे ज्ञान नही अपितु निर्वाण प्राप्त किया था) तथापि यह बिश्नोई समुदाय के लिए इस वृक्ष की महत्पूर्णता को राष्ट्रीय स्तर पर सफलतापूर्वक रेखांकित करती है.
कंकेड़ी एक बहि:प्रजनन (Outbreeding) करने वाली प्रजाति है और इसी कारण इसमें बहुत अधिक स्व-प्रजाति विविधता (Intraspecific variablity) पाई जाती है. बीजों से अंकुरित होने वाले पौधे आकार एंव प्रकार में अलग होते हैं. इस प्रजाति में अलैंगिक अथवा वानिस्पतिक प्रजनन (Asexual or vegetative reproduction) नही पाया जाता है. इस कथन से अभिप्राय यह है की इस वृक्ष को कलम विधि से नही उगाया जा सकता है. कंकेड़ी की आनुवंशकीय दृष्टि से एक समान, स्वस्थ एंव बड़ी संख्या में पौध प्राप्त करने के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उपरोक्त संस्था के द्वारा उत्तक संवर्धन तकनीक (Tissue culture technology) पर आधारित नवाचार (Protocol) को सफलतापूर्वक विकसित किया गया है.
भारत में कंकेड़ी कई प्रदेशों में पायी जाती है किन्तु राजस्थान राज्य इस प्रजाति का प्राकृतिक निवास (Natural habitat) है और यहाँ भी यह सबसे अधिक बिश्नोई निवासित क्षेत्रों में पायी जाती है. एक प्रकार से चिंकारा (Indian gazelle) के अतिरिक्त कंकेड़ी वृक्ष बिश्नोई उपस्थिति का भौगोलिक संकेतक (Geographical indicator) बन चुकी है.  वन, खदानों एंव उसर भूमि मे लगाने के लिए यह वृक्ष अनुसंशित (Recommended) है एंव इस लेख के माध्यम से मैं इसे नागरीय वानिकी (Urban forestry) के लिए अनुसंशित करती हूँ. नागरीय वानिकी से अभिप्राय इसे शहरों में चिन्हित खाली स्थानों, सड़कों, फुटपाथ, पार्कों आदि में लगाने से है.
औषधीय दृष्टि से कंकेड़ी एक चमत्कारी वृक्ष है. इसके विभिन्न भागों (छाल, पत्ते, कांटे, लकड़ी, जड़, राल आदि) के विभिन्न औषधीय गुण वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित एंव निबंधित (Scientifically approved & documented) है. पारम्परिक औषधिय पद्धति (Traditional medicinal system) में इसकी जड़ को जठरांत्र की परेशानियों (Gastrointestinal disorders), विशेष रूप से पेचिश (Dysentery) में, कच्ची टहनियों को मुंह के छालों (Mouth ulcers) में, पत्तेदार टहनियों के काढ़े (Decoction) को दांत दर्द (Toothache) में, छाल को पीसकर सरसों के तेल में मिलाकर जुंओं (Lice) से मुक्ति पाने के लिए सिर में लगाने में, कच्चे पत्तों को पीलिया (Jaundice) में, पत्तों को पीसकर दूध के साथ मिलकर बच्चों के पेट के कीड़ों को दूर करने की दवा के रूप में, पत्तों की राख को घाव भरने की दवाई के रूप में और फलों को रक्त शोधक (Blood purifier) के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है. बिश्नोई समुदाय के लोगों के द्वारा इसका प्राचीन काल से ही औषधीय प्रयोग किया जाता रहा है इसलिए यह वृक्ष उनके सामुदायिक वनस्पतीय औषधि शास्त्र (Ethnomedicinal Botany) का अंगभूत भाग है.
सन 1999 में टॉयमा मेडिकल एंड फार्मास्यूटिकल यूनिवर्सिटी जापान (Toyama Medical and Pharmaceutical University, Japan) के डॉ हुसैन एंव उनकी टीम के द्वारा किये गये अनुसन्धान में कंकेड़ी वृक्ष से प्राप्त कुछ सार द्रव्यों के एच.आई.वी. एड्स (HIV AIDS) में प्रभावशाली होने की बात कही गयी है. इसी प्रकार के अन्य वैज्ञानिक अनुसंधानों में इस वृक्ष से प्राप्त रसायनों के अल्सर, कैंसर, (विशेषत रक्त कैंसर), बहुऔषधिय प्रतिरोधी टी. बी. (Multi drug resistant tuberculosis) आदि में प्रभावी होने का तथ्य प्रकट हुआ है.
अन्य वैज्ञानिक अनुसंधानों में कंकेड़ी के एक से एक चमत्कारी चिकत्सकीय प्रभावों (Healing effects) की खोज सामने आ रही है. चिकित्सा विज्ञान भविष्य में इस वृक्ष से असाध्य रोगों के लिए रामबाण औषधियां तैयार करेगा इस बात की पुख्ता उम्मीद राखी जा सकती है.
क्या भगवान जाम्भोजी ने स्वयं का निवास इस वृक्ष में बताकर इसकी अद्वितीय चिकित्सकीय विशेषताओं (Healing features) की ओर संकेत किया था? क्योंकि ईश्वर की उपस्थिति में किसी प्रकार के रोग दोष की उत्पत्ति अकल्पनीय है जो इस वृक्ष के सदैव रोगरहित रहने से भी प्रकट होती है. बिश्नोई साहित्य के गहन अध्यन से यह बात उजागर हो सकती है जिस पर मैं प्रयत्नरत हूँ. इस वृक्ष की उत्त्पति एंव विकास (Origin & evolution) का अध्ययन भी इसके बिश्नोइज्म से सबंध पर और अधिक प्रकाश डाल सकता है. बिश्नोई श्रद्धा से आकंठ जुड़े इस वृक्ष का उद्धार इसे बिश्नोई धर्मस्थलों एंव घरों में अधिक से अधिक उगाकर एंव प्राकृतिक निवास (Natural habitat) में इसके अत्यधिक दोहन (Overexploitation) पर नियन्त्रण करके किया जा सकता है.
लालासर की निर्वाण कंकेड़ी की छाँव में होने वाले अलौकिक अध्यात्मिक अनुभव के हम सब साक्षी हैं. इसी कंकेड़ी के कुछ बीज मैंने 2011 में अपनी यात्रा के दौरान इक्कठे किये थे और उनसे उत्पन्न कुछ पौधे रांची (झारखण्ड) में प्रतिकूल जलवायु के उपरान्त भी सफलतापूर्वक बढ़ रहे हैं. क्या यह भी इस वृक्ष की अलौकिकता का एक और संकेत है?

संतोष पुनिया   
(Inspiration) प्रेरणा: भगवान जाम्भोजी
(Dedication) समर्पण: मेरी उन पूर्वज करमा एंव गौरां को समर्पित जिन्होंने बिश्नोइज्म में आत्मबलिदानों की गौरवशाली परम्परा का आरम्भ किया.  
(Acknowledgements) आभार: विष्णु बिश्नोई https://www.facebook.com/Jaani29
जय बिश्नोई https://www.facebook.com/jb.jaipur